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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मैं मेहनतकश मजदूर हूँ

गोपाल कृष्ण पटेल "जी1

वे भूखे प्यासे, चरमराय होंठ, सूखे गले,पिचके पेट,पैरों में छाले लिए पसीने से तरबतर, सिर पर बोझा उठाए सैकड़ों मील पैदल चलते पत्थर के नहीं बने पथरा गये चलते- चलते। टूटी आस, अटकती सांस के लिए घर को जा रहे हैं, जहाँ भूख पहले से प्रतीक्षा में है उनकी। वे मजदूर हैं, मेहनतकश हैं चोरी कर नहीं सकते बस मर सकते हैं। मिल जुलकर सह लेंगे,कोरोना की मार मिलने की चाह बहुत है कैसा है हमारा परिवार, काम हुआ बंद, घर जाने मजबूर हूँ मैं मेहनतकश मजदूर हूँ।


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