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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

प्रकृति

गोपाल कृष्ण पटेल "जी1

कितनी मनोरम है ये धरती प्रकृति का संरक्षण है जरूरी। कल कल बहते झरने का पानी क्योकि ये है जीवन की धुरी।। चहचहाते हैं गगन में पंछी जीवन का राग हैं गुनगुनाते। मस्त पवन के झरोखे में हम सब हैं बहते जाते।। फूलों के रस को चूसने कितने भौरें हैं आते। फूलों के कलियों में घूम-घूम के, देखो कैसे हैं इतराते।। निर्मल बूंदे देखो बारिश की, मन को कितना हैं भाती। धरती को करे हरा- भरा सबको जीवन हैं देती।। प्रकृति का ख्याल रखें, संरक्षण के लिए करें काम। मिल जाएगा सबको सभी तीरथ और चारों धाम।। प्रकृति की देखरेख,संरक्षण कर प्रदूषण को बनायें शून्य। प्यारी मनोरम इस धरा पर पाएं महायज्ञ का पुण्य।


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