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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

प्रकृति

दिव्याशा-यायावर

पहले एक इंसान होता था इन इंसानो की जमी पर था एक अपनत्व का वृक्ष उस वृक्ष पर चाँदनी रात में आते थे जुगनू जब सो जाती थीं ठुमकती गौरैया आज एक आदम होता है जो रहता है खुद में और खुद की इस जमी पर इसने उगाएँ हैं वैमनस्यता और भौतिकता के वृक्ष जिस पर मँडराते चमचमाते जुगनू राख हो गए और उस राख में खाक हो गयी वो ठुमकती गौरैया जिसके टूटे हुए घुँघरू देखकर रो पड़ती है आज प्रकृति भी...!!


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