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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

वियोग

दिव्याशा-यायावर

जो तुम गढ़ते हो ना मेरे वियोग को परिभाषाओं में सजाते हो उसे अपने शब्दों के व्याकरण से क्या हो जब पता चले तुम्हे कि तुम्हारी बनाई हर परिभाषा अर्थहीन और बेमतलब ही रही सुनो, रोक दो कलम को मेरे वियोग के अश्रु उपहास उड़ाते हैं तुम्हारा जब जब तुम बाँधने की कोशिश में रहते हो इसे मेरा वियोग अल्हड़ है उस झरने के पानी सा जो बहता है अविरल तुम देखकर इसे सुकूँ ले सकते हो मेरे हँसते मुस्कराते आँसुओं में डूब सकते हो किन्तु इन्हें बाँधने की चेष्टा में मात खाओगे हर दफा मेरा वियोग आजाद है एकतरफा है ये हँसकर बिलखता है समझ सको तो समझना अगर स्पर्श की चेष्टा करोगे तो इसके भँवर जाल मे फँस जाओगे जैसे फँसे थे वो अभिमन्यु उस चक्रव्यूह में....!!!!


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