मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

सावन

डॉ दिग्विजय कुमार शर्मा "द्रोण"

सावन के मस्ते महीने में धरती पर राग बरसता है.... प्रकृति इठलाती बल खाती हरियाली चहूँ और लरजती है।1 सावन.. सबको अपने इस यौवन का श्रंगारिक रूप है आकर्षित करता, फैली चहु ओर है हरियाली इठलाती है बल सी खाती।2 सावन... बादल रह रह कर हैं आते अम्बर से धरा पर मिलने को, अपनी वो शीतल बूंदों से है गोद हरी वो कर जाता।3 सावन... धरती के यौवन का पुष्प यहां खिलता सुगन्ध है फैलता, यह सुंदर दृश्य देखकर सब मद मस्त है सावन यह गाता।4 सावन.... है हरीतिमा चहु ओर यहां बादल घिर घिर कर मुस्काता, इस धरा को रहता इंतजार बादल कहता मैं हूँ आता।5 सावन.... दोनों के नेह मिलन से है चहु ओर प्रकृति की सुंदरता, फैलाये हाथों सा पर्वत धरती घाटी बन शरमाती।6 सावन.... जब शिव का डमरू बजता है घन घोर घटा है बरसाती, यह दृश्य अनोखा सुंदरतम बादल है सिंचित कर जाता।7 सावन.... जंगल में मंगल है होता आनन्दित मौसम है लगता, हर जीव जंतु करते विचरण धरती के आंचल में पलते।8 सावन.... चाहत की सौम्य सजलता से कोना कोना जगमग करता, इस नेह, प्रीत के मौसम में सूखे पौधे, वन सब हैं लहराते।9 सावन.... आजादी सबको मिल जाती गर्मी से तृप्त वो सब पाते, यह मस्त महीना सावन का सब देव भी विचरण करने आते।10 सावन.... भू-लोक लगे सुंदर इतना अंतर मन हर्षित हो जाता, बस एक बूंद को तरस रहा हर जीव यहां पर पाने को।11 सावन.... एक बीज की चाहत यह रहती जल्दी यौवन हो खिल जाऊं, सावन का रूप अनोखा है धरती जनती प्रकृति बनती।12 सावन.... आशाओं के दीपों को हम हर पल दमकाते रहते हैं, एक बूंद निशा में आ टपकी धरती अम्बर संग महक उठी।13 सावन.... पशु-पक्षी सब विचरण करते मानव पेंगें भरते नभ को, चाहत है आसमान छूने की प्रकृति का रूप बदलने को।14 सावन.... यहां पुष्प, वृक्ष सब हैं झूमे आकाश, गगन को है चूमे, हम सब मिलकर अब गाएंगे नाचेंगे, मिल धूम मचाएंगे।15 सावन.... एक आस बसी दिल में इतनी सब रहे सुरक्षित औ प्रशन्न, सावन न जाना तुम जल्दी जी ते जी हम मर जायेंगे।16 सावन....


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें