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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

सावन की फुहार

आशुतोष कुमार

आई सावन की बहार लायी है बरखा बहार झम-झम बरसे फुहार मस्त बहे पवन ब्यार। फूलों के संग भंवरे फलों संग है पपीहे सजना के संग सजनी करती रही है श्रृंगार। नदियाँ बहें कल-कल मांझी के मन हलचल बोल रही है नाँव मझधार कैसे जाएँ हम उस पार। मेंढक करे टर्र-टर्र काली घटा, घुप अंधेरा बारिश की मूसलाधार संगीत सुनाये हर पल।


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