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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

सोने नहीं देतीं

अशोक बाबू माहौर

सोने नहीं देतीं मुझे, विचलित मन की पीडाएँ और आपदाएँ नयी नयी । करुँ पर क्या? उडाकर हंसी चली जाती बैरिन सी ये हवा । ना काम कोई ना अन्न घर में बजाऊँ अब किसकी कुंडी रुठ गयी है शायद मेरी किस्मत आज फिर से । अब जो होगा सो होगा ठीक होगा नहीं फिर कहीं हाहाकार कहीं समय का ताण्डव होगा बस धैर्य रखूँगा मैं जीता रहूँगा ठगा सा भोला बनकर ।


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