मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मां

आशीष कुमार वर्मा

जब खुशी गले तक समा जाती है आंखों से फिर छलक आती हो तुम! अंतस में उमड़ती है तुम्हारी पीड़ाएं और अपनी बेबसी का मंजर नाचने लगता है मेरे आगे बाहें तरसती है... याद आतें हैं पुराने दिन याद आती हैं वो सारी रातें जो समस्याओं से लबालब थीं पर तुम्हारे होने से वो सब सह लिए जाते थे हंसते रोते जी लिए जाते थे सारी कमियों एवम् अभावों के बाद भी तुम्हारा होना ही सब कुछ होना था सब कुछ हो जाना भी तुम्हारा होना नहीं हो सकेगा नहीं ये संभव नहीं ...


कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें