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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

हमारी हर समस्या गैर जरूरी बताई गई थी

आशीष कुमार वर्मा

हमारी हर समस्या गैर जरूरी की तरह बताई गई थी इतिहास के पन्नों में गैर जरूरी बताया गया था उनके द्वारा हमसे रूबरू होना समाज के सबसे निचली मंजिल पर बसे हम लोगों को कभी नहीं देखा गया नींव की तरह उपेक्षित छोड़ दिया गया था हमेशा की तरह हमारे हुक्मरानों के फैसलों में आखिरी पंक्ति में खड़े हम लोग उनकी प्राथमिकता में नहीं थे उनके फैसलों की मार सबसे ज्यादा हमीं ने खाई थी हमें नहीं लगा था उतना डर महामारी से जितना डर हमारे पुरुखों को लगा था भूख से, अभाव से, गरीबी से उस महान परंपरा के भावी भविष्य की तरह आज भी जीवंत हम लोगों ने सबसे बड़ी महामारी की तरह परोसा हुआ वरदान अंगीकार किया था अपने महान परंपरा के महान वाहक की तरह आज भी हम चले जा रहें थे आंखों में रिरिआती हुई पीड़ाएं हिचकोले लेे रहीं थीं सब्र की सारी सीमाओं का अब आत्मा में हनन हो रहा था मुनियां के पेट का दर्द अब नसों में उमड़ने लगी थी और सामने पसरा था अनंत आकाश आकाश की ऊंचाई जितना ही हमें तय करनी थी दूरी आकाश जितना ही हमारे आंतों में पीड़ा थी आकाश जितना ही यह दुर्धर्ष समय लिपटा हुआ था हमारी देह से उसी तरह अनिश्चित समस्याओं का ज्वार पसरा पड़ा था इस अनंत आकाश में...


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