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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

दस्तक

अनिल कुमार

दरवाजे की दस्तक से माँ की बूढ़ी आँखे चमक उठी शायद शहर से बेटा लौट आया यह सोच के बूढ़ी माँ दरवाजे की तरफ थी बढ़ी कुंड़ी खोल के माँ ने झटपट दरवाजा खिसकाया पर बाहर बेटा नहीं था कोई गाँव से ही था मिलने आया माँ का मन फिर संकुचित था बेटे की दस्तक में बूढ़ी माँ का आत्ममनन था पर बेटा भूल चुका था शायद इस चौकट को वह लौट के अब इस घर नहीं आने वाला लेकिन बूढ़ी माँ का मन था कब बेटे को था भूलने वाला बस चौकट को तकती थी हर दस्तक बूढ़ी माँ को अपने बेटे की आहट लगती थी...।


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