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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

द्वंद

अखिलेश कुमार डोभाल

स्कूल और अभिभावकों के बीच द्वंद्व है, फीस कैसे लोगे जब स्कूल बंद हैं, सही बात- ऑनलाइन पढ़ाई कैसे होगी, अब पता चला, खुद पढ़ा लेंगे, पर फीस न देंगे, सही है- टीचर की जरूरत ही क्या है, जब हमने ही पढ़ाना है, टीचर्स इंतज़ार करें, कोरोना के ख़त्म होने का, फिर नौकरी कर लेना, क्या? टीचिंग ही करोगे, आत्मनिर्भर बनो ऐसे - टीचर तो कोई भी बन जाता है, जिसको कुछ नहीं आता, उसे पढ़ाना आता है। माफ़ करना मुझे, ये सोच सोचनीय है, टीचर को टीचर्स डे पर एक पेन दे दी, बच्चे के अच्छे अंकों पर एक हंसी काफ़ी है, आज सब बेहाल हैं, टीचर्स को छोड़कर, बाकी सब कंगाल हैं।। न दो फीस खुद टीचर बनलो, हम भी तो पढ़े, बच्चों को भी कहो, सरकारी विद्यालय में पढलो, न फीस की चिंता, न ऑनलाइन की ख़ास झंझट, खाना खाकर आएंगे, एक स्वस्थ देश बनाएंगे।। सरकारी- प्राइवेट का खेल खत्म होना चाहिए, टीचर को टीचर रहने दो, बाकी सबको अधिकार चाहिए, दोगली बातों से अब डर लगता है, मेरे बच्चों को, क्या टीचर मुक्त भारत चाहिए? जिम्मेदारी हमारी है या नहीं, जो देश के भविष्य को ज्ञान देता है, वो ऐसे समाज के आगे अपनी जान देता है।।


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