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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

वो मुझे नहीं मिलती

अजय एहसास

ढूंढता हूं जिसे कि, वो मुझे नहीं मिलती चाहता हूं जिसे कि, वो मुझे नहीं मिलती दर्द का रिश्ता हमारा रहा है सदियों से दुकां में ढूंढी खुशी, वो मुझे नहीं मिलती।। मिली जो पहली नजर, वो मुझे नहीं मिलती रखा था जिसकी खबर, वो मुझे नहीं मिलती तरस गये है अब दीदार उसका पाने को नज़र जो ढूंढे नज़र, वो मुझे नहीं मिलती।। शराफत उसकी गज़ब, वो मुझे नहीं मिलती नज़ाकत उसकी गज़ब, वो मुझे नहीं मिलती हाथों से चेहरा ढका था जो उसने शरमाकर हया थी उसकी गज़ब,वो मुझे नहीं मिलती।। अब तो मुस्कान गज़ब,वो मुझे नहीं मिलती थी मेरी जान गज़ब, वो मुझे नहीं मिलती उसकी फितरत थी अलग सोचने की आदत थी जो थी इन्सान गज़ब, वो मुझे नहीं मिलती।। आंखों में आब गजब, वो मुझे नहीं मिलती संजोया ख्वाब गजब, वो मुझे नहीं मिलती हटा के रुख से अपने परदा अदब फरमाया की जो आदाब गजब, वो मुझे नहीं मिलती।। देखे मुड़ मुड़ के रस्ते, वो मुझे नहीं मिलती कटा सफर जो हंसते, वो मुझे नहीं मिलती सुनाया उसका जो किस्सा सभी फरिश्तों को तरसते हैं फरिश्ते, वो मुझे नहीं मिलती।। है उसकी सोच अलग, वो मुझे नहीं मिलती है उसकी खोज अलग, वो मुझे नहीं मिलती जिन्दगी जीने का उसको सलीका है मालूम दिलों में मौज अलग, वो मुझे नहीं मिलती।। जो सबसे बेहतरीन, वो मुझे नहीं मिलती दिखे जो नाज़नीन, वो मुझे नहीं मिलती मिला जो उससे तो फिर दिल में ये 'एहसास' हुआ है जो सबसे हसीन, वो मुझे नहीं मिलती।।

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