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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

मत कुछ रूमानी लिखना

शुचि 'भवि'

ऐ मेरे मन देखो अब तुम,मत कुछ रूमानी लिखना पपड़ीदार हुई आँखों में, बस थोड़ा पानी लिखना रेन डाँस कर थिरके कोई छप्पर कोई टपक रहा फैशन है जूठा वो छोड़े रोटी को इक तरस रहा संस्कारों का ह्रास हुआ जब,अब तो नुकसानी लिखना पपड़ीदार हुई आँखों में, बस थोड़ा पानी लिखना उन्नति का ही नाम लिया बस जब जब नीचे आये तुम मजहब की दीवार बनाकर बोलो क्या कुछ पाये तुम अपने इन कर्मों को तुम भी, अपनी मनमानी लिखना पपड़ीदार हुई आँखों में, बस थोड़ा पानी लिखना कितनी आँखों में हैं कितने दफ़्न ख़्वाब तुम क्या जानो सरहद पर खोया है माँ ने लाल उसे अपना मानो देशप्रेम की राहों को तुम,हरदम मस्तानी लिखना पपड़ीदार हुई आँखों में, बस थोड़ा पानी लिखना ऐ मेरे मन देखो अब तुम,मत कुछ रूमानी लिखना पपड़ीदार हुई आँखों में, बस थोड़ा पानी लिखना

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