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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

हृदय मे एक द्वंद है

डॉ दिवाकर दत्त त्रिपाठी

लौट जाऊँ या चुनूँ मैं पंथ दुर्गम ? रास्ता जो था सरल वो बंद है । हृदय में एक द्वंद है । मूकदर्शक हो गये सब गीत मेरे । कौन मेरी पीर की छवि को उकेरे ? नैन से निःशब्द मोती झर गये हैं, जब कभी पीड़ा के छाये घन घनेरे। रस नही है शेष ,शायद कल्पना में, लग रहा नीरस मुझे हर छंद है । हृदय में एक द्वंद ...... जगत मिथ्या के भरोसे चल रहा है। सत्य का सूरज दिनो दिन ढल रहा है। न्याय की मृत देह को खाता रहा है , पाप हर एक पालिका में पल रहा है। साँप अब रक्षा करेंगे मेंढकों की , जाग मन! तू मूढ़ है,मतिमंद है ! हृदय में एक............... क्यों विषैले नाग पूजे जा रहे हैं ? मान बस बहुरुपिए ही पा रहें हैं । कहीं पें शुचि स्वप्न कोई जल रहे हैं? विष भरे बादल भला क्यों छा रहे हैं? मनुजता के पाँव में बंधन पड़े हैं, दनुजता हर ओर से स्वच्छंद हैं । हृदय में एक द्वंद हैं..........

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