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Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

रोते बादल

डॉ दिवाकर दत्त त्रिपाठी

सारी रैना रोते बादल । घूमा करते हैं, आवारा । जैसे कोई गम का मारा । थक कर फिर ये झुक जाते हैं, जैसे कोई पथिक हो हारा। रात रात चपला चिल्लाती , भला कहाँ हैं,सोते बादल ? सारी रैना रोते............... जब वियोग,घन नैना,तरसे। उर पीड़ा कहने को बरसे। दादुर, झींगुर, मोर , पतंगे, घन के दुख में ,अतिशय हरषे। पुरवाई का छोर थामकर , अपना दुखड़ा ढोते बादल । सारी रैना ................... ये धरती का रुप सजाते । धानी चूनर ले के आते । यह नवयौवन दे देतें हैं सर सरिता सारे बलखाते। मरकत मणि सा चमका देते, पत्ता- पत्ता धोते बादल । सारी रैना ...................

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