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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

ज़िंदगी वीरान है

ऋचा चौधरी "सहर"

मौत की महफ़िल सजी है ज़िंदगी वीरान है दूर तक मंज़िल नहीं है राह भी सुनसान है माँगते हो क्यों भला रब से मिरी खुशियाँ सदा इन ग़मों के साथ जीना और भी आसान है हाँ ज़माना जानता है हाल इस दिल का मगर जो मिरे दिल में बसा है अब तलक अंजान है तोड़कर के तुम उसे क्यों दैर में रख आये हो तितलियों के साथ रहना फूल का अरमान है काट लेती उम्र सारी वस्ल की चाहत में पर हिज्र मेरे आशना का तुगलकी फ़रमान है मर चुके हैं ख़्वाब सारे मर चुकी सब ख़्वाहिशें मर चुकी है रूह फिर इस जिस्म में क्यों जान है आज फिर देखी ष्सहरष् ने तीरगी दीपक तले आज फिर लगने लगा के रोशनी नादान है

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