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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

बाबा बुला रहे हैं
(आल्हा छंद)

महेन्द्र देवांगन "माटी"

आया सावन महिना भक्तों , जपो प्रेम से शिव का नाम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।। रिमझिम रिमझिम पानी बरसे , भक्त लगाये जय जयकार। भक्तों की टोली हैं निकली , सुन ले बाबा आज पुकार।। रहे सुखी सब प्राणी अब तो , बने सभी के बिगड़ी काम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।। काँवरिया सब पैदल चलते , पड़ते हैं पांवो में छाल। नहीं कभी परवाह करे वह , करे न कोई बांका बाल।। हर हर बम बम गाते जाते , लेते हैं सब शिव का नाम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।। झूमे नाचे मस्ती में सब , बाबा का लेकर के नाम। जो भी पूजे सच्चे दिल से , बन जाते हैं बिगड़ी काम।। औघड़ दानी शिव भोला है , सुबह शाम सब करो प्रणाम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।। केशरिया का बाना पहने , जाते हैं बाबा के द्वार। काँधे मे गंगा जल लेकर , करते हैं सब जय जयकार।। कोरोना से तारो बाबा , करते हैं हम तुम्हे प्रणाम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।। आया संकट जग में बाबा , अब तो उसको देवें तार। बीमारी सब दूर भगाओ , कोरोना को पल में मार।। भक्त सभी अब द्वार खड़े हैं , पूजा करके आठों याम। बाबा बुला रहे हैं देखो , काँवरिया को अपने धाम।।

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