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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 4, अंक 90,अगस्त(प्रथम), 2020

समर वसुधा की तप्तता में
आल्हा छंद

अनुश्री 'श्री'

समर वसुधा की तप्तता में, भले किये हों तुमने द्वंद्व । बैठ द्वार की उष्ण छाँव में, सहती थी मैं अंतर्द्वंद्व ।। गोली खाई जब भी तुमने, ढोया छाती पर अंगार । सौंदर्य निखर कर आया त्यों, सत्रहवाँ मेरा शृंगार ।। उजड़ गई मस्तक की लाली,हुए अवर्णे कक्ष-कपाट । विधवा बन भी पूर्ण सुहागन, मुखड़ा मेरा रहा सपाट ।। तेरे विजय की सुगाथा में,हुआ समर्पित है सिंदूर । करने अमर तेरे गात्र को, हुआ अश्रु भी मुझसे दूर ।। तुम्हें देखकर तीन रंग में, हावी पीड़ा पर अभिमान । छीन लिये सब गहने तुमने, दिया अमूल्य उच्च सम्मान ।। हुई ओढ़नी वर्ण विहीना, पायल ने खोयी झंकार । गौण हैं सूचक समृध्दि के, प्रधान जन-गण-मन टंकार ।। छोड़ अकेली यशोधरा को, देकर नन्हें से उपहार । चले गए तुम बुद्ध मार्ग पर, खोजने राष्ट्र में परिवार ।। दर्पण में दिखती छवि तेरी, भौंहों मध्य तेरा प्रताप । लक्ष्मीबाई सा हिय मेरा, ना करने देता संताप ।। अनुगामिन बनकर तेरी मैं, पाऊँ तुमसा ही प्रतिरूप । रख जीवित सर्वदा स्वयं में, बनूँ प्रेम का तेरे रूप ।। समाधि स्थल पर जाकर प्रियवर,दे आऊँ तुम्हें प्रेम पत्र। प्रति निशा सुहागन बन तेरी,आत्म पर वारूँ आत्म छत्र ।।

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