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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो

सलिल सरोज

मुझे भुला दिया तो रात भर जागते क्यूँ हो मेरे सपनों में दबे पाँव फिर भागते क्यूँ हो एक जो कीमती चीज़ थी वो भी खो दी अब बेवजह इस कदर दुआ माँगते क्यूँ हो इतना ही आसान था तो पहले बिछड़ जाते वक़्त की दीवार पे गुज़रे लम्हात टाँगते क्यूँ हो गर सब निकाल दिया खुरच-खुरच के जिस्म से फिर मेरी हँसी से अपनी तस्वीर रँगते क्यूँ हो


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