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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

याद आती रही उम्रभर

प्रीती श्रीवास्तव

मुझे उसकी याद आती रही उम्रभर।
उसकी तहरीर सताती रही उम्रभर।।

न दीदार हुआ उसका न इकरार कभी।
फिर भी गम वो दे जाती रही उम्रभर।।

इक नजर को तरसा किये ताजिन्दगी।
जख्म हमको दिखाती रही उम्रभर।।

वक्त रेत की तरह ही फिसलता गया।
चांदनी आकर जलाती रही उम्रभर।।

किसी रोज मौत आ जायेगी सफर में।
जिन्दगी बेसबब शर्माती रही उम्रभर।।

जनाजे की मेरे सनम कर लो तुम तैयारी।
आरजू फिर फिर लुभाती रही उम्रभर।।
  

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