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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

हर तरह का दिन

बृज राज किशोर "राहगीर"

दी कभी ख़ुशियाँ, कभी बेहद रुलाया दोस्तो। ज़िन्दगी ने हर तरह का दिन दिखाया दोस्तो। वक़्त ऐसा भी रहा जब ज़िन्दगी दुश्मन लगी, साथ इसने यार बनकर भी निभाया दोस्तो। था बहुत गमगीन उस दिन, पर सुकूं दिल को मिला, एक बच्चा सामने जब मुस्कुराया दोस्तो। झर गए पत्ते सभी, बस डालियाँ बाक़ी रही, वक़्त आने पर शज़र फिर लहलहाया दोस्तो। आज तक अपना बहीखाता समझ पाया नहीं, उम्र गुज़री, क्या कमाया, क्या गँवाया दोस्तो। दर्द से तो किस तरह शिकवा करूँ, जब राह में आख़िरी दम तक उसे हमराह पाया दोस्तो। शायरी 'बृजराज' की सबकी पसन्दीदा रही, नाम लेकिन बज़्म में कम ही दिलाया दोस्तो।


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