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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

वो बहाने कर गये।।

अजय एहसास

नजरों से नजरें मिलाकर वो दिवाने कर गये मिलने की गर बात की तो वो बहाने कर गये। नजरों से वो दूर जाते देखते हम रह गये दर्द कितना भी हुआ पर हम तड़पकर सह गये जिनकी खातिर दिल को अपने साफ सुथरा था किया दिल को मेरे आज वो खण्डर पुराने कह गये घर मे न आने के लाखो वो बहाने कर गये।। देखते ही देखते ना जाने कब क्या हो गये ह्वाट्सअप पर आज भी तो उनके मैसेज है मगर अब न वो है बोलते लगता है जैसे सो गये अब ना मैसेज करने के भी वो बहाने कर गये।। दिल पे पत्थर रख के उनके जुल्म कितने सह गये खेल खेलें है बहुत रखकर अंधेरों में हमें प्यार के रस अपनी आंखों मे गिराते रह गये भाव में बह जाने के फिर वो बहाने कर गये।। कितना भी बचकर चलें फिलहाल लेकिन जल गये गैर के तावे पे सेंकी रोटियां भी है बहुत भीतर तो कड़वा जहर था बाहर से मीठा कर गये मुझको डस जाने को फिर से वो बहाने कर गये।। बोलें ना कोई बात वो अपने गुमां में रह गये बनके शकुनी साथ मेरे चाल भी कितनी चली चाल उल्टी पड़ी तो वो खुद भी उल्टी कर गये और पलट जाने को भी फिर वो बहाने कर गये।। ना मिलो हमसे कभी वो जाते जाते कह गये रूठना और खिलखिलाना पागलों सा चीखना याद हैं वो दूर जाकर याद आते रह गये पर दूर जाने के भी वो लाखों बहाने कर गये।। अपना दिन उनके लिए बरबाद करते रह गये बोलियां या गोलियां या जहर का 'एहसास' है दी गई तकलीफ को हम हंसते हंसते सह गये जो किये सब करने के वो फिर बहाने कर गये।।


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