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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

ईस्माइल बाबा का मेला

विशाल नारायण

आप इस्लामपुर में आए और ईस्माइल बाबा का नाम नहीं सुना तब तो आप इस्लामपुर आये ही नहीं. एक पीर फकीर जैसा आदमी, मुश्किल से पाँच फीट लंबा, माथे पर जटाजुट बाँधे, त्रिपुण्ड़ तिलक लगाए. नहीं सुना आपने. कोई बात नहीं. उसकी और पहचान बताए देते हैं. किसी मंदिर से मिले लाल, केसरिया रंग के चादर से बदन ढ़क रखा होगा. किसी मजार, श्मशान से उठायी हरे रंग की चादर को लुँगी बना लिया होगा. और चेहरे पर झक्क सफेद मुस्कान तैर रही होगी. हमेशा मुस्कुराते रहते और सबको हँसाते भी रहते. बस इसीलिए, ईस्माइल बाबा नाम पड़ गया उनका.

कहाँ से आए, किस जात धर्म के हैं कुछ पता नहीं. मंगलवार को महावीर मंदिर में खा लिया तो शुक्रवार को किसी मियां जान के यहाँ सेवईयाँ जीम लीं और बाकी के दिन के लिए गुरूद्वारे का लंगर तो है ही. भोजन प्राप्ति के बाद के समय का उनका मुख्य पेशा है लोगों को हँसाना. क्या बच्चे, क्या बूढ़े सबसे दुनिया भर की बातें करेंगे. जी खोल के हँसेंगे और हँसाएँगे भी. इसके बाद ईस्माइल बाबा का मुख्य त्योहार है भारत का राष्ट्रीय पर्व यानि कि स्वतंत्रता दिवस. पन्द्रह अगस्त से महीनों पहले इसकी तैयारी शुरू कर देते. प्राथमिक विद्यालय से लेकर इंटर कालेज तक के सांस्कृतिक कार्यक्रम की अघोषित जिम्मेवारी ईस्माइल बाबा की हो जाती. उधर मंच पर बच्चे नाच रहे होते और इधर भीड़ में ईस्माइल बाबा नाच रहे होते मस्त मग्न होकर.

उस साल भी पन्द्रह अगस्त की तैयारी बड़े धूमधाम से की थी ईस्माइल बाबा ने. पर सावन के मेले में जरा सी बात पर हुई बहस ने साम्प्रदायिक रूप ले लिया था. धुआँ तो साफ दिखता था पर चिंगारी न थी. इसमें आजाद मैदान पर झण्ड़ा फहराने को हुई खींचतान ने आग का रूप ले लिया. देखते ही देखते क्षण भर मे खाड़े में तब्दील हो गया आजाद मैदान. लोग दस से बीस और बीस से सैकड़ों हो गये. बात डण्डे से शुरू होकर भाले गंडासे पर आ गयी. वार पर वार होने लगे. सब अपना बल पौरूष दिखाने लगे. पर सबसे बड़ा पराक्रमी निकला ईस्माइल बाबा. पचास बरस के शरीर में न जाने कहाँ से इतना जोश आ गया था. जिधर से निकलता भीड़ को चीर के रख देता. सबको अलग अलग कर देता. पर जैसे ही हटता लोग फिर से उलझ पड़ते. और कुछ लोगों को तो इस संत पर भी दया नहीं आई. लाठियों से पाट दिया. फिर न जाने किसने कितना वार किया कौन जानता है. हरे रंग की हरियाली खून से लाल हो गई और चेहरे की झक्क सफेदी काली. इक तिरंगा जमीन पर बिछ गया था दूसरे तिरंगे को बचाने के लिए. बगल ही में राजकीय कृत मध्य विद्यालय इस्लामपुर में तिरंगा आपने पूरे शाने शौकत से लहरा रहा था.

साम्प्रदायिक नशा जितनी तेजी से चढ़ता है, उतनी तेजी से उतरता भी है. ईस्माइल बाबा के माथे से बहते खून ने सबका नशा काफूर कर दिया था. क्या हिन्दु, क्या मुस्लिम सब रोए. जो गलियों में फिर-फिर के सबको हँसाया करता था आज उसके लिए आँसुओं की नदियाँ बह रही थीं. उस अर्थी को हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबने मिलकर कंधा दिया. लगा सबको मिलाने के लिए ही शहीद हो गये ईस्माइल बाबा. और तब से हर पन्द्रह अगस्त को लगा करता है इस्लामपुर में ईस्माइल बाबा का मेला.


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