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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

सकुचि दीन्ह रघुनाथ

डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

सुन्दर कांड के दोहा क्रमांक 49 (ख) के अनुसार

जो संपति सिव रावनहिं दीन्हि दिये दस माथ
सोई संपदा विभीसन्हि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।


अब यहां प्रश्न उठता कि जब भगवान श्रीराम ने सुन्दर कांड तक लंका पर विजय ही प्राप्त नहीं की थी तब वह लंका भगवान विभीषण को कैसे दे सकते थे ?

अस कृपा सिव जगत प्रावनी।
देह सदा सिव मन भावनी।।
एवं मस्तु कह प्रभु रन धीरा।
मांगा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तब इच्छा नाहीं।
मोर दरस अमोघ जग माही।।
अस कहि राम तिलक लेहि सारा।
सुमन वृष्टि नभ भई अपारा।।
रावण क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचण्ड।
जरत विभीषणु राखेऊ दीन्हेहु राज अखण्ड।।
जो सम्पति सिव रावनहि दीन्ह दिये दस माथ।
सोई सम्पदा विभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।


उपरोक्त पंक्तियों से विदित होता है कि हालांकि विभीषण व्यक्त रूप में भगवान की मात्र भक्ति मांग रहे थे पर अव्यक्त रूप में उनके मन में लंकाधिपति बनने की आकांक्षा थी। भगवान ने किस विश्वास के साथ विभीषण का राज तिलक कर दिया ? वह इसलिये कि भगवान में अदम्य आत्म विश्वास था। उसकी पहली परख महर्षि विश्वामित्र को हुई थी। इसीलिये ताड़का मारीचि एवं सुबाहु जैसे दुर्दम्य राक्षसों से लड़ने के लिये किशोर वय में ही भगवान राम एवं लक्ष्मण को महाराज दशरथ से मांग कर ले गये थे। इसी आत्म विश्वास के भरोसे राम दुर्गम वन में चैदह वर्ष तक जाने के लिये तैय्यार हो गये।

भगवान राम नीति निपुण भी थे। श्रीमदभागवत् गीता के दसवें अध्याय में भगवान ने कहा है कि नीति रश्मिजिगीषताम्। यानि कि विजय की इच्छा रखने वालों में मैं नीति हँू। यहाँ गुण विशेष रूप से तब उजागर होता है जब उन्होने बलि को छिप कर मारा था। उन्हें मालूम था कि जो व्यक्ति भी सामने से बालि से लडे़गा उसका आधा बल बालि में चला जायेगा अतः आत्म विश्वास एवं नीति निपुणता के बलबूत पर ही उन्होने सुग्रीव से वह दिया था कि वे बालि का वध कर देंगे एवं राज्य सुग्रीव को दे देंगे।

भगवान ने विभीषण का राज्य तिलक कर यह स्पष्ट कर दिया कि उन्हें लंका का राज्य नहीं चाहिये। वे रावण से लंका राज्य छीनने नहीं आये थे। वे मात्र सीता जी को मुक्त कराने आये थे। जिससे बगैर सीताजी के अयोध्या लौट कर उन्हें शर्मिन्दा न होना पड़े।

भगवान ने कमजोरों को ताकत देकर उनकी कमजोरी को अपनी ताकत बनाया फिर चाहे विश्वामित्र जीे हों या सुग्रीव हों या विभीषण। एक विद्वान ने मेरा ज्ञान वर्द्धन किया कि भगवान ने सुग्रीव का राजतिलक इसलिये किया कि वह उनसे विद्रोह न करे। पर ऐसा नहीं है। भगवान सुग्रीव के भरोसे रावणपर विजय प्राप्त करते नहीं आये थे। बल्कि सुग्रीव को ही डर था कि यदि भगवान ने उन्हें ठुकरा दिया तो रावण उन्हें मार डालेगा।

कहते हैं कि समुद्र में सारी नदियों का जल मिला रहता है जो पावन पवित्र माना जाता है इसलिए राजतिलक समुद्र के जल से ही किया जाता है।


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