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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

नारी

तनुजा नंदिता

सोचा था गर सब अपना दे दूंगी... तो भी तुम मेरे अपने होगे... गैरों से निभा कर ,मुझको तुम ने किया खाली मुझको.... कि तुम्हें फिक्र औरों की जिक्र भी भाये औरों की... बोल कितना खाली रह जाऊँ... कितना मन को अपने समझाऊँ.. इक तुम्हारे पास होने की आशा मन की निराशा किसे दिखलाऊँ.. साथ तेरा-मेरा वो हम का साज़ हम में जलन की क्यों पीड़ा पाऊँ.. भले हो मतभेदों से टकराव... ग़मों से भी मुँह न छिपाऊँ... विश्वास का घर सच माटी का आस ने बांधी है प्रेम की छांव तुम बिन मन का आंगन सूना तीन दिन बीते, सदियों का अंधेरा.. प्रेम की भाषा, किसे सुनाऊँ जीवन की अभिलाषा तुम से होती... बता अब किस ओर मैं जाऊँ.. कुछ न बचा जो पास मेरे..इक प्रेम है.. जिसमें भी तुमको पाऊँ......!!


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