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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

लोकतन्त्र के नायक

शंकर सिंह

ह्त्या करते हो तुम किसी जनतंत्र की नही जिसकी तुम दुहाई देते फिरते हो हत्या होती है वो किसी शब्द मे लिपटे तंत्र से भी अधिक उन आम इन्सानो की जिनकी संवेदना पाकर तुम नायक बनते हो अब तुम नायक हो जैसे नायक के पास होती है ढेर सारी शक्ति है तुम्हारे पास भी है कि तुम अब हवा मे घोल देते हो विष मरने का सिलसिला जारी रहता तुम्हारे जशन का दौर जारी रहता और अंत मे तुम्हें नायक की उपाधि से नवाजा जाएगा तुम हंस रहे होगे उन तमाम हत्याओ पर आखिर तुम नायक हो ? और ये दौर भी नायकों का है ।


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