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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

इक माँ का दूजी माँ को पैगाम

शबनम शर्मा

आंसुओं में डूबी इक माँ ने, दूजी माँ के पास ये पैगाम भेजा है, कि उसे अपने दिल के टुकड़ों कों, माँ की रक्षा के लिये सरहदों पर भेजा है, उसकी अपनी जिन्दगी अब श्मशान से कम नहीं, रात-दिन उसे इक अजीब सा अंदेशा रहता है। पाला-पोसा, कूट-कूट कर भरी वीरता उसमें, मैंने अपने लाल को, मौसी के घर भेजा है। रक्षा तेरी वो कर सके, उसे भरपूर शक्ति देना, दुश्मनों के छक्के छुड़ा दे, उसे वा साहस देना। पर इक गुज़ारिश है मेरी तुझ से ये धरती माँ, हो सके तो लाल मेरा मुझको तू लौटा देना।


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