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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

बदरी

डॉ राजू तिवारी

घटा घिरी घनघोर, काली काली कजरी चहुंओर। फन फैलाकर फैली ऐसे, जैसे कोई काली नागिन हो।। रिमझिम रिमझिम रिसते नीर, बिन उसके करेजे पर तीर। बाउली बदरी बरसे जायं, नयन बाउली को तरसे जायं।। बरसी बदरी जब जमके, देखी दुनिया थम थम के। बुझी प्यास वसुधा की, मचल उठी सरिता भरके।। कान कोयल कूक से वंचित, बारिश से दादुर है हर्षित। एक ही काल खण्ड में है, किसी का दुःख किसी का सुख संचित।।


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