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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

वह दौड़ रही है

प्रदीप कुमार तिवारी

वह दौड़ रही है जीवन के स्याह पहलुओं से आगे,
वह दौड़ रही है जंजीरों को तोड़ मनुज ने जो बांधे।
ना रोक सकेगा कोई अब ये तो सरिता बन बैठी है,
बाँध तोड़ जब नदी बही तो टिका नहीं कोई आगे।।

मेहनत की भट्ठी में जलकर हिमा बनी है जलधारा,
जग रोक नहीं पायेगा इसको चढ़ा हुवा इसका पारा।
हिंदुस्तान की मिट्टी से निकली यह मेहनतकश बिट्टी,
सम्पुर्ण जगत में चमक रही बनकर सुनहरा एक तारा।।

उम्मीदों से बढ़ आगे जग को  चौंकाया है तुमने,
बन के धुरंधर जो आये सबको हराया है तुमने।
दौड़ पड़ी जब बनके हवा ना पास ठहर पाया कोई
रह आगे जगवालों से खुद नाम बनाया है तुमने।।
  

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