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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

वह रचना

पवनेष ठकुराठी ‘पवन’

मधुर व्यवहार से
क्रुद्ध शिला भी
विनयी बन जाती है। 

नित आग्रह से
रूठी प्रिया भी
परिणयी बन जाती है

वीरता से
कायर योद्धा भी
दिग्विजयी बन जाती है

उतरकर आती है जो
आत्मा से कागज पर
वह रचना 
जरूर एक दिन
कालजयी बन जाती है।
  

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