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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

स्याही बनकर आती रहो

पवनेष ठकुराठी ‘पवन’

बहुत उदास है जिंदगी
इसलिए तुम मुस्काती रहो
हम हंसते रहेंगे। 
बहुत बेसुरे से हैं सुर
इसलिए तुम गाती रहो
हम सुनते रहेंगे। 
चांद के पास अपनी रोशनी भी तो नहीं
इसलिए तुम किरण बनके चमकाती रहो
हम चमकते रहेंगे। 
बहुत नादान है ये दिल
कुछ समझता ही नहीं
इसलिए तुम समझाती रहो
हम समझते रहेंगे। 
जिंदगी कटेगी नहीं तुम बिन
मालूम है हमें
इसलिए स्याही बनकर
कलम में आती रहो। 
हम उम्र भर ढाई आखर
लिखते रहेंगे।
  

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