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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

आश्चर्य ! पर सत्य

कविता गुप्ता

घने कोहरे, कड़कती ठंड में पेड़ निर्वस्त्र, मानव भारी भरकम कपड़ों से लद जाता। ग्रीष्म ऋतु में, वृक्ष ओढ़ते रंग बिरंगे व् नए , हमारा यह तन, वस्त्र पहनने से कतराता। पेड़ों के पुराने, परिवर्तित कहीं काम आते, परन्तु मानव ? हर दिन बदल 2 इतराता। तरु बड़े सादे, शिकवा न चेहरे पर शिकन, इन्सान औकात से आगे नकल कर जाता। वृक्ष परिंदों का आवास, मीठे फलों का स्वाद सर्वस्व अर्पित करने की निराली हैं मिसाल। 'मालिक' की सोच, सुघड़ता न कलम की पकड़, सृष्टि की अनुपम रचना उसकी कला का कमाल।


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