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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

गुरु पूर्णिमा

अनुजीत इकबाल

गुरुदेव आओ, मेरे नयनपट बंद करके मुक्तकंचुक करवा दो मुझे इस संसार के मायापाश से और विस्मृत करा दो भुवनकोश का मिथ्या ज्ञान, फिर इस सीमासेतु से परे आत्मा से स्पर्श करवा दो दुर्गाह्य ब्रह्मस्वरूप के एहसास को। जिस चूडामणि रज पर अथक चलते थे तुम कभी अब भी वहां जाकर तुम्हारी ऊर्जा से मेरा अंतस अंकमाल होता है और पूर्ण हो जाता है हमारा अलौकिक मिलन। तुम्हारे कालखंड से भी अधिक सप्राण पाया है मैंने तुम्हें। तुम्हारा होना उस कालचक्र के विशिष्ट भाग तक सीमित न था, उससे भी कहीं अधिक साकार व्यापक है, तुम्हारा विस्तार। गहन वेदना और धूमिल अस्तित्व मेरा आ भी जाओ बाबा अब मेरे अंतरागार। देखती हूं तुमको सदैव उत्पत्ति के अवलंबन में हृदयाकाश को संवेदित करते प्रत्येक स्पर्श में। कब बांध सकता है तुमको कोई रंगों और छंदों में चूक जाती है शब्दावली और अलंकार दुःसाध्य है शब्द संचयन तुम्हारे बखान में। सकल ब्रह्मांड की चेतनाओं का सार सूक्ष्मत्व से पृथ्क और अधिकतम के अंत में, नित्य नूतन रहते हुए दीर्घकालीन पुरातन हो, सुसंपन्न हो हर कालखंड के संकल्प में।


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