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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

बारिश

अनिल कुमार

खिल उठता है मन जब होता है धरती से बारिश का मधूर मिलन बूँद-बूँद ऐसे झरती है जैसे बजता हो कोई वीणा के तारों का सरगम धुल जाती है सारी माटी कल तक थी जो बंजर सम नाचते, गाते है नर, पशु गण और खुशी मनाता हल चल देता है खेतों के रण खिल उठता है तब धरती का सूना आँगन धोकर बारिश की बूँदें कर देती है धरती को पावन।


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