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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

भीड़ में खो जाएँ

डॉ०अनिल चड्डा

चलो उस भीड़ में खो जाएँ, जो हमारी तरह अकेली है, अकेले-अकेले रह कर भी, इक-दूजे के हो जाएं हम खुशियाँ उसमें ढूंढते हैं, जो खुद भी खुश रह सकता नहीं आओ खुद में खुशियाँ ढूँढते हैं कुछ दूजों को दे देते हैं कोई सफर यहाँ आसान नहीं कोई मंजिल इतनी पास नहीं कभी ठोकर खा कर बढ़ते हैं कभी चलते-चलते गिरते हैं जो हिम्मत करके बढ़ते हैं वो अंजाम से अंत में मिलते हैं क्यों ढूंढें ऐसे कांधों को जो खुद से नहीं सम्भलते हैं


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