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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

मिट्टी की दीवारें

वीणा विज’उदित’

ऐ दीदी!ज़रा आना मेरे साथ, वो सामने वाली पुरानी कोठी में । क्यों क्या हुआ? मैंने उठते हुआ पूछा।” वो कामवाली बाई आज नहीं आई है। बहुत तंग करती है। हर दूसरे दिन छुट्टी। सुना है एक नेपाली परिवार यहाँ रहने आया है,उसे पूछती हूँ शायद आ जाए” मीना मेरी पड़ोसन बोली। हल्की-हल्की ठंड में सूरज का ताप सेंकने मैं बाहर आकर अभी बैठी ही थी। कि उसके आग्रह पर चल पड़ी ,उसके साथ। नई सदी के आरंभ होते ही मानो होड़ लग गई थी– गली की सारी पुरानी कोठियां टूट-टूट कर नए डिज़ाइन की बन रही थीं। यही इकलौती कोठी थी जो गली के माथे पर नज़रबट्टू की तरह जर्जर हालत में थी। कारण स्पष्ट था, इसका मालिक “साउथ हॉल”इंग्लैंड में रहता था। अब तो तालों से माथा सजाए कोठी खाली पड़ी थी, लेकिन गर्भ में किस्से छिपे थे इसके। कोठी के दाहिनी ओर छोटा सा चार फुटिया गेट है।गेट खोलकर भीतर जाने पर कोठी के पिछवाड़े मिट्टी से बने तीन कमरे एक साथ सटे बने थे। जाकर देखा कि दो में धोबन का परिवार रहता था और एक में वह नेपाली युगल रहने आया था।

मीना तो नेपालन से बातचीत करने में व्यस्त हो गई और मैं..? मैं तीन दशक पूर्व ख्यालों में सफर कर रही थी!मेरी नज़रें उस तंग कमरे को माप रही थीं। छत सातेक फुट ऊँची, कमरा आठ फीट लम्बा और उतना ही चौड़ा था। इकलौता दरवाजा पाँचेक फुट ऊँचा,छाती पर पुराने जमाने की एक फुटिया साँकल ढोए था। उस कमरे के बाशिन्दों की गिनती की कल्पना करती मैंं भीतर चली गई थी। और उसकी मिट्टी की दीवारों पर हाथ फेर रही थी, मानो उनको शाबाशी दे रही थी। फिर भारी मन से लौट आई थी घर। उधर मीना की बात बन गई थी, सो वो तो अपने घर चली गई थी। लेकिन मुझे तीस वर्ष पूर्व के विचारों के भँवर में फँसाकर….

“तेरी माँ की–तेरी भैन की” ऐ मोटी-मोटी गालियों की जोर-जोर की आवाज़ें सुनकर मैं भीतर से बाहर की ओर निकली तो देखा इसी कोठी के मेन गेट के बाहर कुछेक लोग खड़े थे। बुजुर्ग सरदार (बिन पगड़ी के) अपनी बीवी को बालों से खींचकर बाहर निकाल रहे था और भारी-भरकम गालियों का उच्चारण करके अपनी भद्दी शब्दावली का तमाशा दिखा रहा था। उन्होंने बाईं ओर के दो कमरे किसी तिवारी नाम के दो भाइयों को किराए पर दे रखे थे। बड़े भाई बीच-बचाव करने आए तो उनको परे धकेल दिया सरदार ने!तभी घूंघट से मुंह छिपाए कोई पैंतीस वर्ष के करीब की स्त्री ने बीच में आकर इस नारी-प्रताड़ना से सरदारनी को बचाया और घर के भीतर ले गई। बाद में पता चला वो सरदारजी की बड़ी बहू थी।

मैं विशेष घ्यान न देते हुए, अपने काम में लग गई।

लेकिन राजू जैसे कुछ पचा नहीं पा रहा था। बोले जा रहा था” बीजी, यह सरदार जिस दिन सुबह से ही शराब पीना शुरू कर देता है,उस दिन सरदारनी खाने के लिए बोलती है तो ये उसे मारता है। जैसे आज मार रहा था।”यह सुनकर लगा शराब पीकर इंसान की मानसिकता कितनी रुग्ण हो जाती है कि उसे सुध ही नहीं रहती। अपनी कमजोरी पर शर्मिंदा होने की बनिस्पद वो नारी से अमानवीय व्यवहार पर उतर आता है। और नारी…? वह लाचार है सदा से, अपने कर्त्तव्य-बोध से बंधी है। क्या वो बदले में कुछ भी नहीं कर सकती? नहीं..वो तो संस्कारों की बेड़ियों में जकड़ी है,जो उसके पल्लू में माँ-बाप ने बाँध दिए थे, पराए घर भेजते समय। मन कसैला सा हो गया था।

अगले दिन हमारे बाएँ तरफ वाली कोठी से निकलती

शर्मा जी की बहू शशी मिली। हमारे गेट पास-पास थे । वो खींचकर मुझे अपने घर ले गई। लाज़मी था कल की घटना पर चर्चा होनी थी। उसने बताया कि सरदार जी और मेरे ससुर (जो अंग्रेज पत्नी के इंग्लैंड लौट जाने से अब अकेले हैं)वहीं उनके घर इकट्ठे बैठकर देर रात तक शराब पीते रहते हैं। फिर सैर करने निकल पड़ते हैं। कभी-कभी तो सड़क किनारे नाली में शराब के नशे में धुत्त गिरे पड़े मिलते हैं। यह सुन कर लगा, एक से बढ़कर एक रहस्यमयी बातें हैं यहाँ तो । असल में हमें इस गली में कोठी लिए हुए अभी थोड़ा समय ही हुआ था। उसने जानकारी दी,”मेरे ससुर वकील हैं। इंग्लैंड बार एट लॉ करने गए थे, साथ ही मेम ब्याह लाए थे। उससे दो बेटे हुए। ममी सारी उम्र स्कूल में पढ़ाती रही,फिर पति की शराब की लत से तंग आकर बड़े बेटे किशन को लेकर वो वापिस इंग्लैंड चली गईं। अब मेरे पति मोहन और मैं उनके साथ रहते हैं। मेरा प्रेम-विवाह है मिन्नी से!”बहुत साफ दिल और मिलनसार लगी शशी ।

कुछ दिनों बाद अचानक साँझ ढले फिर शोर सुनाई दिया। हमारा नौकर राजू दौड़ गया वहीं। वापिस आकर रिपोर्ट देने लगा ,” बीजी, बुड्ढे ने शराब के नशे में अपने पोते को खूब मारा। बेचारी बहू बहुत रो रही थी,बाहर सीढ़ियों पर बैठी। मैंने पूछा,” कहाँ है उसकी बहू?” इस पर राजू ने जो किस्सा सुनाया, उसे सुनकर मैं परेशान हो गई थी। आज भी मेरे मानस-पटल पर वो इस भांति अंकित है कि उसे धुंधला करना भी चाहूं तो वह और आलोकित हो उठता है। रिश्तों के मायने झुठलाने लगता है।

इतनी बड़ी कोठी में बहू और उसके तीन बच्चों को न रख कर सरदार ने उन्हें वो पिछली कोने वाली मिट्टी की कोठरी रहने को दी हुई थी। क्योंकि सरदारजी बेटे के विदेश जाने से रुष्ट हो गए थे। वो बड़ा बेटा अफ्रीका चला गया था कमाई करने,परिवार को माँ-बाप के पास छोड़कर। जबकि सरदार अपने घर में उनको पाँव भी नहीं रखने देता था। कोई आठ साल का होगा पोता, उससे बड़ी दो बहनें थीं।

आज उस कोठरी को नज़र भर कर देख लेने से मैं उन सब के उसमें रहने के हालात पर सोच में पड़ गई थी। कितना कठोर हृदय होगा सरदार जी का! या वो किस हद तक रुष्ट थे अपने पुत्र से कि नन्हे-नन्हे कदमों को भी कभी घर के भीतर प्रविष्ट नहीं होने देते थे। हम सब सुनते आए हैं कि दादा-दादी का लाड़-प्यार पोते-पोतियों के लिए हर सीमाएँ लाँघ लेता है। लेकिन इतनी क्रूरता…विकल हो उठी थी मैं वस्तु स्थिती भाँपकर! मैं कई बार देखती थी क्रमश: १०-१२ साल की दोनों बहनें जब दादा को घर पर नहीं देखतीं तो कोठी के वराण्डे में गिद्दे(पंजाबी नृत्य) की बोलियाँ डाल कर तिवारी जी की बेटी को भी गिद्दा सिखाती थीं।

“बारी बरसी खटन गया सी,खट के लयांदा पतासा
सौरे कोलो चुंड कडदी,नंगा रखदी कलिप वाला पासा”

कई बार उनकी बोलियाँ सुनने और गिद्दे के steps देखने मै भी अपनी खिड़की में खड़ी हो जाती थी। वही घर संगीत से चहक उठता था। बोलियाँ हों और पैरों में थिरकन हो तो स्थिरता का क्या काम?

एक दिन पता चला कि सरदार अपनी सरदारनी के साथ हरिद्वार तीर्थ करने गया है। अब बहू, बच्चों को लेकर सारा दिन कोठी के वराण्डे में ही रहने लगी थी। मानो मुर्दे में जान आ गई हो। एक दिन बच्चों को साथ लेकर वो मेरे पास भी आई। बिना प्रेस किए कपड़े थे उनके, पर साफ थे। उसने बताया कि अफ्रीका जाने के बाद से उसका पति एक बार भी घर नहीं आया था। लोगों के कपड़े सी-सी कर वो गुजारा कर रही थी। सास छुप-छुप कर कुछ मदद कर देती है कभी कभार। बच्चों से छुप के रो लेती है उसकी याद में।

छोटा बेटा(देवर)तो ब्याह करके बीवी को साथ ले के विलायत चला गया था। तभी इसके भी जाने से ये ज़्यादा गुस्सा हो गया है।

पहले गुस्से में उसे मारने लग जाता था। छाती पर हाथ डालता था। पर जब से इस मिट्टी की कोठरी में उसे रखा गया है, इस आसरे में वह महफूज़ हो गई है। इन मिट्टी की दीवारों ने माँ की गोद की तरह उसे अपनी गोद में चैन की नींद सुलाया है। नहीं तो कोठी में वह सारी रात डरती रहती थी। शराबी का क्या भरोसा? कोठरी में वो तीनों बच्चों को छाती से लगाए सो जाती है,भीतर से जंदरा(ताला) लगाकर!

उसके जाने के बाद मैं नारी-विमर्श की बावत सोचने लगी थी। वह निरीह स्त्री किस तरह इस त्रास को झेल रही थी। कब अन्त होगा हमारे समाज की जड़ों में समाए,स्त्री के इन कष्टों का! बेचारगी का कफन वो जीते जी ओढ़े रखती है। मर-मर के जीना भी कोई जीना कहलाता है !

कोई दस दिनों के पश्चात् सरदार अकेला वापिस लौट आया। घूंघट की ओट से बहू ने सास के विषय में पूछा। बच्चें ने भी ‘बिब्बी’ कित्थे आ? पूछा तो सरदार बोला,” वो गंगा नदी में नहाने उतरी तो पता नहीं कहाँ बह गई। वापस ही नहीं पलटी, न ही किसी को दिखी। बहुत ढूंढी, नहीं मिली। तीन दिन वहीं घाट पर बैठा रहा। लगता है गंगा माई उसे साथ बहा ले गई। अपने पटों पर हाथ मार के रोने लगा,”हाय, चली गई मेरी सरदारनी”!यह सब सुनते ही बहू ने जोर-जोर से रोकर छाती पर हाथ मार-मार कर सयापा डाल दिया। बच्चे भी खूब रोने लग पड़े। दोनो किराएदार भाई उनके परिवार व आस-पड़ोस के लोग मातम-पुर्सी के लिए पहुँचने लग गए थे। अगले दिन उनके पिंड(पुश्तैनी गांव)से भी रिश्तेदार आए। काना -फूसी का बाजार गर्म था। “बीवी को खुद डुबो आया है।” नारी-विमर्श के अनेकों चेहरे उभर रहे थे सरदार के कारण।

बातें और सिर्फ बातें, इसके सिवाय किसी के हाथ-पल्ले कुछ नहीं लगा। करने को भी कुछ नहीं था। जब मृतक का शरीर ही नहीं था तो सारे किरया-कलापों के झंझटों से पूरा छुटकारा था, पीछे रह गई थी एक अनबूछ पहेली! हाँ, माँ की मौत की खबर मिलने पर दोनो बेटे भी पहुँच गए थे। बड़े बेटे ने अपने परिवार की जब इतनी दयनीय दशा देखी तो वो अपने परिवार को साथ ही ले गया। वो मुझे मिलने आई थी जाने से पहले। मैंने भी चैन की सांस ली थी,उसके दुखों भरे जीवन के छुटकारे पर।

इंसान समय बीतने के साथ-साथ, अतीत के सारे शिलालेख साधारण समझकर विस्मृत कर देता है, किन्तु प्रकृति, पुरानी बातों या घटनाओं को भावी सृजन से नूतन अंशों में परिणत कर फिर से जीवंत बना देती है। इस पर मानव हृदय पुन: उसी अतीत में पहुँच जाता है। मैं भी मस्त थी अपने परिवार में। कि एक दिन खूब जोर-जोर से कुछ तोड़ने की आवाजें सुनाई दीं,इससे पहले कि हम कुछ सोच पाते,हमारी डोर बैल बजी। तिवारी जी घबराए से थे। बोले,” बहन जी, ज़रा हमारे साथ चलिए। सरदार जी चार दिनों से भीतर हैं,और दरवाजे के नीचे से कीड़े बाहर आ रहे हैं। दरवाजा खुल नहीं रहा, तोड़ना पड़ेगा।” मैंं आज फिर उस विस्मृत अतीत की डगर पर पहुँच गई थी। पर इंसानियत के नाते हम सब वहाँ गए। बदबू के कारण सब ने नाक बंद किए हुए थे। हथौड़े से दरवाजा तोड़ा गया। दरवाजा गिरते ही भीतर से बदबू का ऐसा भभाका निकला कि सब सड़क पर भागे। बेचारे तिवारी भाई भीतर गए और जो कुछ देखा वो भी घबरा कर उल्टे पाँव बाहर आ गए। और बोले,” सरदार ने कच्छा और बनियान पहन रखी है, जमीन पर पड़ा है। उसके सारे शरीर पर काले चींटें रेंग रहे हैं, लगता है पिछले चार दिनों से।”ऐसा भयावह विवरण सुन कर कोई भीतर देखने तक नहीं गया! बेचारे तिवारी भाइयों ने ठेले पर लदवा कर लाश का अन्तिम संस्कार करवाया। न ही उसके लिए किसी ने मातम किया और न ही उसके नसीब में कोई आँसू आया।

कुछ वर्षों बाद बड़ी बहू मेरे घर अचानक पहुँची, अपने बेटे और अँग्रेज बहू को लेकर। आश्चर्य मिश्रित खुशी से मैंने उनका स्वागत किया। जाने से पूर्व बहू-बेटे को मेरे घर बैठाकर,अपनी मिट्टी की कोठरी को वो जी भर कर देखने गई। वापिस आकर बोली,”बहन जी मैं अपनी मिट्टी की दीवारों को जफ्फियाँ डाल कर आई हूं,माँ जैसे ध्यान रखा था न उन्होंने मेरा।”

इसी कारण भाव विह्वल हो आज मैं उन मिट्टी की दीवारों में धरती माँ का प्यार देख पा रही थी।


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