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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

गुल्लक

सुदर्शन खन्ना

‘कमला, तुम मिट्टी के बर्तन बहुत मेहनत से और बहुत सुन्दर बनाती हो’ मास्टर जी ने स्कूल के चहारदीवारी के बाहर साइकिल-स्टैंड पर अपनी साइकल रखते हुए कहा। कमला भी उसी चहारदीवारी के साथ पटरी पर मिट्टी के कई बर्तन बनाती जैसे मटका, सुराही, गुल्लक, पक्षियों के पानी पीने का भगौना, दही जमाने के लिए कुंडा, मिट्टी के कुल्हड़ और गिलास आदि आदि। कमला और उसका श्याम दोनों ही बहुत मेहनती थे। जब भी मास्टर जी सुबह स्कूल आते तो सुबह-सुबह कमला और उसके पति को चाक पर बर्तन बनाते देख कर चकित रह जाते। मास्टर जी स्कूल में कला के अध्यापक थे इसीलिए उन्हें इसमें कला का एक पुट नज़र आता था। कमला मिट्टी के कई बर्तनों पर इतना खूबसूरत रंग करती थी कि देखने वाला देखता ही रह जाए।

गर्मियां शुरू हो चुकी थीं। मास्टर जी सुबह स्कूल पहुंचे, साइकिल खड़ी की और कमला से कहा, ‘कमला, आज शाम को जाते हुए एक मटका लेता जाऊँगा, एक बढ़िया सा मटका निकाल रखना।’ ‘जी, मास्टर जी, रेतीली मिट्टी का बना मटका दूंगी जिसमें पानी अच्छे से ठंडा होगा’ कमला ने काम करते हुए जवाब दिया। स्कूल की छुट्टी के बाद मास्टर जी कमला के पास पहुंचे तो कमला ने कहा ‘मास्टर जी, यह लो आपके लिए छांट कर बढ़िया सा मटका निकाल रखा है।’ मास्टर जी ने मटका देखा, बहुत भाया और उन्होंने कमला से पूछा ‘कितने पैसे हुए?’ कमला ने कहा ‘मास्टर जी, रहने दीजिए। आपसे मैं पैसे नहीं ले सकती।’ ‘तो फिर यह रहा मटका, मुझे नहीं चाहिए मुफ्त की कमाई’ कहते हुए मास्टर जी चलने लगे। ‘अरे मास्टर जी, आप तो नाराज़ हो गए, चलिए आप बीस रुपये दे दीजिए’ कमला ने कहा। ‘झूठ मत बोलो तुम, मैंने अपने एक छात्र को भेज कर पता करवा लिया था यह मटका तुम पचास रुपये का देती हो। यह लो पचास रुपये।’ कमला ने कहा ‘मास्टर जी, आप अच्छे इंसान हैं, मैं पचास रुपये रख लूंगी पर आपको मेरी एक बात माननी पड़ेगी।’ ‘कौन-सी बात’ मास्टर जी ने पूछा। ‘आज हमने बहुत सुन्दर गुल्लकें बनाई हैं। एक गुल्लक आपको दूंगी पर उसके पैसे नहीं लूंगी’ कमला ने कहा। मास्टर जी ने कहा ‘अच्छा भई, कुछ तुम्हारी मान लेते हैं।’ यह कहते हुए मास्टर जी ने पचास रुपये दिये। कमला की बेटी पास ही में खेल रही थी, उसे आशीर्वाद दिया और मटका तथा गुल्लक लेकर चले गये।

समय बीतता रहा। मास्टर जी एक दिन स्कूल से रिटायर हो गये। कमला और उसका परिवार अभी भी पटरी पर मिट्टी के बर्तन उतनी ही मेहनत से बनाता और बेचता था। कभी-कभी किसी काम से मास्टर जी स्कूल आया करते थे तो कमला की बेटी को आशीर्वाद दे जाया करते थे। सर्दियों का मौसम था। मास्टर जी को किसी काम से स्कूल आना पड़ा। देखा तो कड़कती ठंड में कमला उसी तरह से काम में मशगूल थी हालांकि इन दिनों उसकी बिक्री न के बराबर थी। मास्टर जी कमला के पास गए ‘आज तुम्हारी बेटी नज़र नहीं आ रही?’ ‘मास्टर जी, वो तो इसी स्कूल में ही पढ़ने लगी है’ कमला ने खुश होकर कहा। ‘अरे, इतनी बड़ी हो गयी है, कौन सी कक्षा में है?’ मास्टर जी ने प्रसन्नता से पूछा। ‘मास्टर जी, बारहवीं कक्षा में है’ कमला ने गर्व से कहा। ‘क्या! बारहवीं में, समय इतनी जल्दी बीत गया पता ही नहीं चला’ मास्टर जी ने कहा। ‘अच्छा एक छोटा मटका दे दो’ मास्टर जी ने फिर कहा। ‘इस ठंड में मटके का क्या करोगे मास्टर जी’ कमला ने हैरानी जताई। ‘तुम्हारे बनाये गये मटके सुन्दर होते हैं, यूंही खरीदने को मन किया है’ मास्टर जी कुछ सोचते हुए बोले। ‘अच्छा, ये लीजिए’ कमला ने मटका दिया और मास्टर जी ने पैसे दे दिए।

मौसम बदलते रहे। गर्मियां अपने शबाब पर थीं। मास्टर जी ने अपने बेटे गिरीश से कहा ‘बेटे, एक मटका ले आना। हां, जिस स्कूल में मैं पढ़ाता था उसके बाहर कमला बैठती है, उसी से लाना।’ ‘पर पापा, वह तो बहुत दूर है, यहीं पास ही में से किसी से ले आता हूं’ गिरीश ने कहा। ‘नहीं बेटे, अगर तुम नहीं जा सकते तो कोई बात नहीं, मैं ही रिक्शे से चला जाऊँगा’ मास्टर जी ने कहा। ‘अच्छा आप जैसे कहते हो, मैं उसी से मटका ले आऊँगा’ गिरीश ने कहा।

‘अम्मा, यह मटका कितने का है?’ गिरीश ने पूछा जो अपने पापा के कहने पर मिट्टी के बर्तन बनाकर बेचने वाली कमला से मटका लेने आया था। अम्मा ने गिरीश को देख कर पूछा, ‘तू मास्टर जी का लल्ला है?’ ‘क्या मतलब?’ गिरीश ने यूं पूछा जैसे कि उसे समझ ही न आया हो। ‘अरे बेटा, तू मास्टर जी का बेटा है न, वही मास्टर जी जो इस स्कूल में पढ़ाते थे’ कमला ने हंस कर कहा। ‘हां, हां, मैं उन्हीं का बेटा हूं’ गिरीश ने जवाब दिया। ‘बेटा, आज जो मटके हैं तुम्हारे मतलब के नहीं हैं, तुम तीन बाद आना, एक सुन्दर सा मटका बनाकर अलग से निकाल रखूंगी, वह ले जाना’ कमला ने कहा। ‘अच्छा, मैं तीन दिन के बाद आ जाऊँगा’ कहता हुआ गिरीश चला गया।

‘क्या हुआ, खाली हाथ आये हो बेटा गिरीश, मटका लाना भूल गये’ मास्टर जी ने कहा। ‘नहीं पापा, जब मैं मटका लेने गया तो उन्होंने मुझे पहचान लिया और फिर तीन दिन बाद आने को कहा है’ गिरीश ने बताया। ‘ओहो तो यह बात है, कमला कभी नहीं बदलेगी, वह हमेशा ही मुझे स्पैशल मटका बना कर दिया करती थी’ मास्टर जी यादों में खो गये। कमला के कहे अनुसार गिरीश तीन दिन बाद मटका लेने गया तो वहां का दृश्य देखकर ठिठक गया। पटरी बहुत सुन्दर रूप से सजी हुई थी, दरियां बिछी हुई थीं, चारों ओर फूल ही फूल लगे थे। कमला की छोटी सी झोंपड़ी बहुत सुन्दर लग रही थी। गिरीश इधर-उधर देख ही रहा था कि कमला ने कहा ‘बेटा, जल्दी आओ, तुम्हारे लिये यह मटका बना रखा है, यह ले जाओ।’ गिरीश ने मटका ले लिया और पैसे देने लगा तो कमला ने कहा, ‘आज जरा फुर्सत नहीं है, मेरी बेटी का सगन है, मैं बाद में ले लूंगी’ और अपने रिश्तेदारों के पास चली गई जो पटरी पर एक टाट पर बैठे हुए थे। ‘ऐसी भी शादी होती है, पटरी पर’ गिरीश सोच सोच कर परेशान हो रहा था। ‘एक हम हैं, इतना दिखावा, इतना खर्चा, फिर भी संतुष्टि नहीं’ मन ही मन गिरीश सोच रहा था। ‘अभी तो चलता हूं, पापा को कह दूंगा, एक मटके के लिए तीन चक्कर लगाने पड़ गये, पर पापा को तो इसी से मटका लेना था न’ बड़बड़ाता हुआ गिरीश चला गया।

‘पैसे दे आए?’ मास्टर जी ने पहला सवाल पूछा। ‘मैं तो दे रहा था पर कमला कहने लगी कि आज मेरे पास टाइम नहीं है बात करने का, बाद में आकर दे जाना, एक मटके के लिए कितने चक्कर लग गए’ गिरीश भुनभुनाया हुआ था। ‘क्यों, ऐसा क्यों कहा उसने?’ मास्टर जी ने सवाल किया। ‘वो कह रही थी आज उसकी बेटी का सगन है, इसीलिए उसके पास बात करने का टाइम नहीं है’ गिरीश ने बताया। ‘क्या! उसकी बेटी का सगन!’ मास्टर जी ने साफ कुर्ता पायजामा डाला और स्टोर में जाकर एक छोटा मटका उठा कर जाते हुए बोले ‘मैं थोड़ी देर बाद ही आऊँगा।’ ‘लगता है पापा को मटका बदलवाना होगा, पर आज ही क्यों, जब उसने कहा है कि आज उसके पास टाइम नहीं है तो पापा रुक नहीं सकते थे। उम्र हो गई है न, मेरी बात तो सुनेंगे नहीं’ अपने आप से कहता हुआ गिरीश अपने काम में व्यस्त हो गया।

‘अरे मास्टर जी आप, क्या बात है, आपका बेटा तो मटका ले गया है न, मैंने उससे कहा था पैसे बाद में लूंगी, आप देख ही रहे हैं आज मेरी बेटी के सगन के चलते मैं कितनी व्यस्त हूं?’ कमला ने कहा। ‘कमला, यह ले’ कहते हुए मास्टर जी ने छोटा मटका कमला की ओर बढ़ा दिया। ‘यह क्या है, इसका तो रंग उतर गया है, इसे रख दो, एकाध दिन में जब समय मिलेगा तो इस पर खूबसूरत रंग कर दूंगी’ कमला ने कहा। ‘अरे कमला, तू रही अनपढ़ की अनपढ़, गंवार, भोली भाली’ मास्टर जी को अकस्मात् हंसी आ गई थी।

‘ऐसा क्या कह दिया मैंने, मास्टर जी’ कमला बोली। ‘देख तो सही मटके में क्या है’ मास्टर जी बोले। ‘क्या है?’ मटके का कपड़े से बंद ढक्कन हटाते हुए कमला उछल पड़ी ‘अरे बाबा, इसमें तो ढेर सारे रुपये हैं। मास्टर जी आप गलती से कुछ और उठा लाये हैं।’ ‘नहीं पगली, मैं बिल्कुल ठीक उठा कर लाया हूं। याद है एक बार तुमने मुझे मुफ्त में गुल्लक दी थी। मैं उसमें पैसे डालता रहा यही सोच कर कि अपनी बेटी के सगन पर उसे खर्च करूंगा। जो गुल्लक तूने दी थी वह भर गई। फिर याद कर एक दिन सर्दियों में मैं तुझसे छोटा मटका, यही वाला, ले गया था। उसमें पैसे भरने लगा। भरता रहा। भरता रहा। अब देख, मेरा तो स्कूल आना कभी-कभार ही होता है। तूने अपनी बेटी के सगन की खबर भेजी नहीं। पर भगवान ने मेरी सुन ली। मेरे बेटे के जरिए मुझे मालूम पड़ गया। तो आज ही मैं यह बड़ी गुल्लक, हां बड़ी गुल्लक ले आया हूं। यह तुम्हारे लिए है’ मास्टर जी भावुक हो उठे थे।

‘मगर मास्टर जी, यह तो आपने अपनी बेटी के लिए जोड़े हैं, मुझे क्यों दे रहे हैं’ कमला ने सवाल किया। ‘तूने मुझे गुल्लक देकर जोड़ना सिखाया और फिर मेरा तो एक ही बेटा है जो कुछ देर पहले तेरे पास आया था’ मास्टर जी ने जवाब दिया। ‘तो फिर किस बेटी के लिए आप जोड़ते रहे’ कमला हैरान हुई। ‘तू बिल्कुल नासमझ है, तेरी बेटी हमारी बेटी के समान है, यह सब उसके लिए है और सुन, कहना तो नहीं चाहता था, पर कहे देता हूं इस मटके में पूरे इक्कीस हजार रुपये हैं। मुझे कहने की जरूरत नहीं है कि तुम इसे संभालकर खर्च करोगी’ कहते हुए मास्टर जी की आंखें गीली हो आई थीं। ‘मास्टर जी, मटके तो मैंने जिंदगी में जितने बनाए कभी उसमें से पानी लीक नहीं किया। पर आज आप की आंखों से पानी आता देखकर मैं मजबूर हूं कि उसे लीक होने से नहीं रोक सकती। भगवान आपको लम्बी उम्र दे और गिरीश को एक सुन्दर-सी बहू’ कहते हुए कमला फफक पड़ी थी और मास्टर जी मुड़ते हुए धीरे-धीरे उसकी आंखों से ओझल होते जा रहे थे। कमला को ऐसा लग रहा था कि उसके यहां बिकने के लिए पड़ी मिट्टी की गुल्लकें भी भावुक हो उठी थीं।


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