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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

हाइकु

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

  1. 
                 
सुबह आई
कलियों  ने खोल दीं
बंद  पलकें

  2. 

खोल घूँघट
सहसा मुस्करायी
प्रकृति वधु

  3.
 
लुटाने लगे
मतवाले भ्रमर
प्रेम- पयोधि

  4.
 
उतरी धूप
खुशियाँ  बिखराते
खिला आँगन

  5.
 
सजने लगे
ऊँची टहनी पर
अनेक स्वप्न  

  6.
 
तितली उड़ी 
बालमन में  सजे 
सपने  कई 

  7. 

नहीं  टूटते 
अपनत्व के  तार 
आखिर यूँ  ही 
  

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