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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

आया वक्त कमीना

राजपाल सिंह गुलिया

रोज खोद कर कूप हमें तो , पड़ता है जल पीना . कहो सेठ जी क्या सचमुच में , कहें इसी को जीना . सुबह सवेरे भूख बिलखती , संग हमारे जागे . दिन भर बैठे राह तकें हम , लेबर चौक अभागे . खरी मजूरी पास न फटके , आया वक्त कमीना . हाल जगत के लगते हैं अब , सचमुच बड़े निराले. कोई खाय तर माल कोई , निगले शुष्क निवाले . पेट भरेगा इसी तरह क्या , पूछे रोज पसीना . मोल स्वेद का मिला न तब, श्रम , फूट फूटकर रोया . घर पर बालक बाट जोहता, रोते रोते सोया . नजर धनिक की देह भेदती , वसन हुआ है झीना . दिन फिरने की आस लिए अब , कब तक जुल्म सहें हम . मालिक अपना पत्थर दिल तो , दुखड़ा किसे कहें हम . तूफां देखा सागर का तो , डगमग हुआ सफ़ीना .


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