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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

चाहत बैठी कोप भवन

राजपाल सिंह गुलिया

तज कर आशा लिए हताशा चाहत बैठी कोप भवन . मन आतुर सा मदनातुर सा , फूला है जैसे सरसों . पल दिन बनकर निकले तनकर , गुजर गए बन कल परसों . भाव हुए हैं भावुक तब से , जब करुणा से मिली तवन . भड़के बल को मचले छ्ल को , लोकलाज ने थाम लिया , टूटे सपने झूठे अपने करने नहीं विराम दिया . जले दीप से हाथ जोड़ कर , राह माँगती आज पवन . टूटी कारा तके सहारा अपराधी से आस लिए . झूठी बातें कितनी घातें , आया है विश्वास लिए . दे। दी उम्मीदों की आहुति , बड़े जतन ने किया हवन .


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