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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

तू वक्त को थाम नही सकता---------

राजकुमार तिवारी (राज)

चाहे जितना दौड़ यहां ले -
तू मौत से भाग नही सकता।
थक जायेगा जिस क्षण में !
तू सांसे मांग नही सकता।।
चाहे जितना दौड़................

ये मेरा है वो तेरा है !
ये अपने वो पराये हैं !
सब आयेंगे दर पे तेरे - 
तू कुछ जान नही सकता।।
चाहे जितना दौड़................

रोते रोते आये यहां पे !
शूरवीर क्यों बनते हो !
प्यासे चाहे जितना हो - 
तू पानी मांग नही सकता।।
चाहे जितना दौड़................

जीवन भर जो रखते रहे !
उसे लेकर जा नही सकते !
दौलत सब ये लुट जायेगी - 
लेकिन तू जाग नही सकता।।
चाहे जितना दौड़................

जीवन के इन चार दिनों में !
कंधे चार बना डालो !
अंत सफर जब आयेगा तो !
दो गज नांघ नही सकता।
चाहे जितना दौड़................

माना वक्त ये तेरा है !
न मारों वक्त के मारे को !
ये समय बदलता रहता है -
तू वक्त को थाम नही सकता।
चाहे जितना दौड़................

मेहनत से या बेईमानी से !
(राज) कई यहां तेरे बने !
मिट्टी में सब मिल जायेगा - 
गगन तू लांघ नही सकता।
चाहे जितना दौड़................
  

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