मुखपृष्ठ
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

विपदाओं को पछाड़कर उठो

जया पाण्डेय 'अन्जानी'

विफलताओं की धूल झाड़कर उठो
तुम विपदाओं को पछाड़कर उठो

यदि भाग्य कहीं असाध्य है
यदि लिखा कहीं दुर्भाग्य है
लकीरें मुट्ठी में डूबा डालो
तुम वह लेख मिटा डालो

इस राख़ में मिलने के पहले
देह चिता में जलने के पहले
अंतस की दाह जगा डालो
तुम जग में आग लगा डालो

शत्रु 'निर्बल' तुमको समझ रहा है
जाओ! रणभूमि में दहाड़कर उठो

यह ग्रास सभी का करती है
यह मायूसी मानवभक्षी है
नर बुद्धि पे अब आ जाओ
इसे काट तुम खा जाओ

इस आँधी की तैयारी पूरी है
बस कुछ कोसों की दूरी है
अपना सामर्थ्य बता जाओ
तुम पर्वत बनके आ जाओ

यह मौन तेरा मनोबल उनका बढ़ा रहा है
जाओ शस्त्र उठाओ! चीत्कार कर उठो!

संकट खड़ा गरज रहा है
सिंह सदृश समझ रहा है
खाल किसीको भेंट करो
जाओ तुम आखेट करो!

तिमिर तुम्हें जो डसते हैं
काल से काले दिखते हैं
कुछ क्षण में मरने वाले हैं
सब सूरज के 'निवाले' हैं

निर्भीक होकर अब करो समर का नाद
रिपु-वक्ष में विजय पताका गाड़कर उठो

तुम विपदाओं को पछाड़कर उठो...

कृपया रचनाकार को मेल भेज कर अपने विचारों से अवगत करायें