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Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

कभी उम्मीद मत करना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

खिजाओं से बहारों की, कभी उम्मीद मत करना
घटाओं में सितारों की, कभी उम्मीद मत करना
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भले हों दूर वे घर से, मगर अपने तो अपने हैं
गैरों से सहारों की, कभी उम्मीद मत करना
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हुए गद्दीनशीं जो हैं, लुटा भरपूर दौलत को
यहाँ उनसे सुधारों की, कभी उम्मीद मत करना
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गरज से ही डराते हैं, बरसते जो नहीं बादल
फुहारों की यहाँ उनसे, कभी उम्मीद मत करना
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मजहब के नाम पर सबको, पढ़ाते पाठ नफरत का
अमन की उन इदारों से, कभी उम्मीद मत करना
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फिदा केशर की क्यारी पर, यहाँ बहरूपिये कितने
विदेशी चाटुकारों पर, कभी उम्मीद मत करना
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मठों में भ्रष्ट सन्यासी, जहाँ हो 'रूप' के लोभी
वहाँ अच्छे विचारों की, कभी उम्मीद मत करना
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