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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

मेरे यार की चौखट

रोहिताश्व मिश्रा 'रौनक़'

एक मुझ ग़म गुसार की चौखट। और इक मेरे यार की चौखट। पहले थी राज़दार की चौखट। अब है वो इश्तेहार की चौखट। उसका दहलीज़ से पलट जाना, और दिल-ए -बेक़रार की चौखट। हाय वो आलम-ए-ख़मीदा सर, और उनके दियार की चौखट। इतनी ख़ाहिश है मुझ को मिल जाए, मेरे पर्वर्दगार की चौखट। उसने की लाख इल्तिजा लेकिन, मुद्दतों बाद पार की चौखट । एक दूजे की हम ही हैं "रौनक़", मैं, और इक इंतज़ार की चौखट।


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