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साहित्यकारों की वेबपत्रिका
Sahityasudha
वर्ष: 3, अंक 66, अगस्त(प्रथम), 2019

पहचान की लकीर ,,,

सुशील यादव दुर्ग

जहां -जहां अब जा रहा , वहीं हुआ हूं ढेर
मेरी उतरन खाल में, जंगल घूमे शेर

तुझको सौप वसीयतें,दे दी सब जागीर
अब खींचो पहचान की,कल से बड़ी लकीर

खुद के खातिर  खींच लूं,संयम खास लकीर
मेरे गुण की खान से , बने स्वर्ण जंजीर 
 
अवगुन मुझमे ना रहे ,बनूं गुणों की खान
छोटे- बडकों की कदर,होवे एक समान 

नदिया सूखी यूँ मिली, तैरा नही जहाज 
मन  भीतर भी है यही, ठहर गया है आज 

हाथ हमे हैं रस्सियां,पावों में जंजीर
मजे- मजे तुम खा रहे, सत्ता सुख की खीर 

कौन यहां पर लूटता, निर्भय हुआ निशंक
गली-गली में देख लो,शहरो का आतंक 

हँसते-हँसते रो पड़ा, मसखरा यहां एक 
कुँए रोज था डालता, नेकी करके नेक 

सुविधा की लो बन्द है, खुली हुई दुकान
इन गलियो चाह की,सुलभ नहीं फरमान 

कल तक पहनी खाल में,शेरों का आभास
आज रिदा से आ रही,खून-खराबा बास

आए दिन होता यहां ,गली-गली बकवास 
जो तुम मेरे आदमी, केवल तुम ही खास 

जाने क्यों इस बार भी,मौसम लगे तनाव
रेतीले मरुथल कहाँ, लेकर घूमे नाव 
  

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