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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



सफर में हूँ दोस्त


सुशील शर्मा


 		 
सफर में  हूँ दोस्त चाहो तो मेरे साथ चलो।
वर्ना चुपचाप बैठे रहो दरबाजे बंद कर।
खिड़कियों में से ताकते रहो तूफानों को।
न मेरा घर है
न मुझे डर है
दर्द है टूटन है।
अकेला हूँ लम्बा सफर है।
लेकिन आज़ाद हूँ
मुझे नहीं रोक पाते घर के दरवाजे ,खिड़कियां।
न ही कोई टिमटिमाते रिश्ते।
सफर में  हूँ दोस्त चाहो तो मेरे साथ चलो।

दौडता हूँ धरा के सीने पर
लिपटता हूँ मासूम कलियों से।
और सो जाता हूँ आसमान की गोद में।
बहता हूँ नदी के संग।
उड़ता हूँ हवाओं के मानिंद।
सफर में हूँ दोस्त चाहो तो मेरे साथ चलो।

शहर के विषधरों से डर कर
दरबाजे खिड़कियां बंद कर
मैं भी बैठ सकता था सुकून से
एक गुमसुदा सा अहसास 
सीने में दफ्न कर सुख की नींद
सोकर अपने जमीर को मार कर
मैं भी रिश्तों के ऊष्मीय बिस्तरों
पर लगा सकता था नींद।
लेकिन मुझ से न हो सका
चल पड़ा अकेला विषधरों के बीच।
अकेला निर्द्वन्द बेधड़क
सफर में हूँ दोस्त चाहो तो मेरे साथ चलो।

मुझे रुकना नही है जिंदगी 
के पार जाना है।
अनहद को गुनगुनाना है।
अपने अंतर्द्वंदों के पार
जहां न निराशा के शूल है
न नागफनी के चुभते अक्स है
न संकीर्णता की संकरी गली
सिर्फ विस्तृत आशाओं का आकाश है।
मन के खिड़की दरवाजे सब खुले है।
सफर में हूँ दोस्त चाहो तो मेरे साथ चलो।

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