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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



अहंकार के नाग


सुशील शर्मा


 		 
अहंकार के कई फन फैले हैं
शेषनाग की तरह
मेरे सिर पर झूलते हैं फुफकारते हैं ।
लोगों को डराते हैं
अहंकार के ये नाग निकलते है
अंदर से फुसकते हुए।
एक नाग मेरे व्यक्तित्व को
दुनिया का सबसे प्रभावशाली
घोषित करता है।
दूसरा नाग मुझे बहुत बड़ा शिक्षक बताता है।
तीसरा नाग हमेशा सम्मान दिलाता रहता है।
चौथा नाग मुझे सर्वश्रेष्ठ
साहित्यकार घोषित करता है।
सारे अहंकार के नाग
मुझे मदहोशी का ज़हर
पिला कर मदमस्त कर देते हैं।
और मेरे लिए दूसरे बहुत
नीचे हो जाते हैं तुच्छ से जीव।
नागफनी की तरह
अहंकार के कटीले पौधे
ऊगे है मेरे अस्तित्व में
मेरे अस्तित्व पर ऊगी ये नागफनी
खुरचती है मेरे अंतस को
लहूलुहान करती है मेरे मन को।
मुझे दूसरों की बुराई अच्छी लगती है।
मुझे अपने सिवा किसी का भला पसंद नही है।
मुझे अपनी सही आलोचना भी जहर लगती है।
मैं अपने अलावा किसी के बारे में नही सोचता।
मैं सफलता का पूरा श्रेय स्वयं लेना चाहता हूँ ।
मैं चाहता हूँ की लोग मुझे जाने।
मैं  सिर्फ वही काम करता हूँ
जिसमे मुझे प्रमुखता मिले
मुझे दूसरों को नीचा दिखाने में
अपनी महत्ता सिद्ध होती दिखती है।
मैं  हमेशा दूसरों को शिक्षा देता रहता हूँ ।
अपनी असफलता के लिए
मैं हमेशा दूसरों को दोष देता हूँ ।
धीरे धीरे मेरा मैं बहुत विशाल अट्टालिका बन गया।
जहां पर सिर्फ मैं हूँ और मेरे अट्ठहास गूंजते हैं।
उस विशाल भवन में कैद मेरा मैं
घिरा है जहरीले नागों से।
और मेरे अहम की नागफनी फैलती जा रही है
मेरे व्यक्तित्व की सीमाओं पर।
उस नागफनी की बाड़ के अंदर
एक शिशु सिसक रहा है।
 

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