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वर्ष: 2, अंक18, अगस्त(प्रथम), 2017



बुद्ध का मार्ग


आशीष वैरागी


 		 
मैं अपनी आत्मा देखना चाहता हूं।
मैं खुद से मिलना चाहता हूं ।
मंदिरों से दूर किसी निर्जीव वीराने में,
जहाँ से नही आती हो कोई दैवीय ध्वनि।
नही मचलती हो कोई सकारात्मक चेष्ठा।
मैं कुछ पल वहाँ रुकना चाहता हूं।
मैं खुद से मिलना चाहता हूं।
युगों, ओर क्षणों का समय अंतराल को,
या हिमालय की चोटी से समुद्रताल को,
मैं अपने पदचाप और स्वांसों की चाल को,
जीवन की जीवटता को मृत्युशैया पे
लेट भीष्म पीढ़ा सहना चाहता हूं।
प्यासी धरा,जलती नदियों का जल,
पाषाणों ,रेतों और सूखे जंगलों में,
मुह बाये झुलसती हवाओं के मध्य,
किसी निर्जन स्थान पर बैठ कर
मैं बुद्ध के मार्ग पर चलना चाहता हूँ।
मैं बस खुद से मिलना चाहता हूं ।
मैं अपनी आत्मा देखना चाहता हूं।

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