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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



खोया बचपन ढूँढ रही हूँ


सुनीता काम्बोज


 
खोया बचपन ढूँढ रही हूँ
वो घर आँगन ढूँढ रही हूँ

अम्मा के चूल्हे की रोटी
वो इच्छाएँ छोटी- छोटी
नीम घनेरा वो आँगन का 
फिर वो सावन ढूँढ रही हूँ
खोया--

बेपरवाही वो मनमानी
दादा –दादी,नाना -नानी
वो संगीत मधुर चक्की का 
छन- छन कंगन ढूँढ रही हूँ
खोया--
वो दर्पण का टूटा टुकड़ा 
आज है मुझसे रूठा टुकड़ा
वो मिटटी में लिपटे कपड़े
वो अपनापन ढूँढ रही हूँ
खोया--
सर पर वो तारों की छत भी
वो हल्के नीले से खत भी
प्यार की खुशबू पावन-पावन
वो पागलपन ढूँढ रही हूँ
खोया--
तीज सुहानी सुन्दर होली
आटे की चौरस रंगोली
माखन से चुपड़ी सी रोटी
तितली चंचल ढूँढ रही हूँ
खोया –
   

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