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वर्ष: 2, अंक 35, अप्रैल(द्वितीय), 2018



बाँच रहे हैं सूरज पंडित


बृज राज किशोर 'राहगीर'


           
बाँच रहे हैं सूरज पंडित,
मई-जून के पतरे जी।

पारा अड़तालिस-पचास पर,
धरती को दहकायेगा।
लू का तांडव सौ-दो सौ को,
यम का द्वार दिखायेगा।
पंखे-कूलर हार मानकर,
शर्मिन्दा हो जायेंगे;
एसी बिजली ना होने से,
डिब्बा बन रह जायेगा।

एडवांस में बता रहे हैं,
गरमी वाले ख़तरे जी।

यूँ ही करते, डरते, मरते,
जौलाई आ जायेगा।
आसमान में फिर इक टुकड़ा,
बादल का मँडरायेगा।
पुरवैया के झोंके आकर,
तन-मन को सहला देंगे;
मानसून का मेला होगा,
अम्बर नाद सुनायेगा।

टिप-टिप कर बूँदे बरसेंगी,
बन जीवन के क़तरे जी।

 

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